सोनीपत. राजनीति में पीएचडी कहे जाने वाले भजनलाल ने जहां से चाहा वहीं से चुनाव जीता। बस करनाल के लोगों ने उनका यह रिकार्ड तोड़ दिया था। वे करनाल, हिसार और फरीदाबाद से सांसद बने थे। जबकि आदमपुर से हमेशा विस का चुनाव जीतते रहे। राजनीति के तगड़े हरफनमौला खिलाड़ी भजनलाल ने प्रदेश की राजनीति में जो चाहा वही किया। वे प्रदेश के हर कोने से चुनाव जीतने में समक्ष थे।
यह कारनामा उन्हें करके भी दिखाया। वे करनाल और फरीदाबाद से भी लोकसभा का चुनाव जीते। जीवन में सिर्फ एक चुनाव करनाल से हार गए थे। जिसका मलाल उन्हें हमेशा रहा। पंचायत समिति हिसार से सदस्य के रूप में अपना राजनीतिक कैरियर शुरू करने वाले भजनलाल 1962 में ब्लाक समिति के सदस्य चुने गए थे। इसी प्लान में चेयरमैन बने। उन्होंने आदमपुर से 1968 मे पहला विधानसभा चुनाव जीता और उसके बाद वे जीतते ही चले गए।
यह उनका रुतबा ही था कि उन्होंने जिसे चाहा उसे ही आदमपुर से चुनाव जिताया। उन्होंने 1987 में अपनी पत्नी जस्मा देवी को विधायक बनाया। उसके बाद 1988 में उन्होंने अपने छोटे बेटे कुलदीप बिश्नोई को विधानसभा में भेजा। उन्होंने फरीदाबाद लोकसभा क्षेत्र से 1989 में सांसद का चुनाव लड़ा और जीत गए। उसके बाद उन्होंने 1998 में करनाल लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा, उन्हें भारी जीत मिली, लेकिन वे 1999 में करनाल से हार गए। उनके करियर में यह पहली और आखिरी हार थी।
चंद्रमोहन को भी बना दिया विधायक
भले ही चंद्रमोहन राजनीति में कामयाब साबित नहीं हुए हो, लेकिन उन्होंने उन्हें छोटी उम्र में ही विधायक बनाया। कालका विस क्षेत्र से चंद्रमोहन ने 1993 में उपचुनाव जीता था। उसके बाद वे 1996, 2000, 2005 में कालका सीट से ही विधायक बने। फिजा प्रकरण के बाद चंद्रमोहन को कांग्रेस ने 2009 के आम चुनावों में टिकट नहीं दिया था।
मारवाड़ से था गहरा लगाव
जोधपुर. हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री एवं अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा के संरक्षक भजनलाल बिश्नोई का मारवाड़ से गहरा लगाव था। 1860 में उनके पूर्वज फलौदी तहसील के मोरिया मूंजासर गांव से पंजाब प्रांत के बहावलपुर (अब पाकिस्तान में) पलायन कर गए थे, लेकिन वे अपने पुरखों की धरा को कभी नहीं भूले। वे जब भी राजस्थान के दौरे पर आए तो पूर्वजों के गांव जाना नहीं भूलते थे। पहले वे कपड़े का व्यापार करते थे। उनका मारवाड़ में आना-जाना लगा रहता था।
मारवाड़ से उनके लगाव का इससे भी पता चलता है कि वे परिचितों से कई बार पूछते रहते थे कि यहां इस बार बारिश और फसलों की क्या स्थिति है। बीकानेर मुकाम में ही उन्हें बिश्नोई रत्न की उपाधि से नवाजा गया था। गत वर्ष 2 मई को मूंजासर गांव में जंभेश्वर मंदिर के लोकार्पण समारोह में उनका आने का कार्यक्रम बना था, लेकिन स्वास्थ्य कारणों से वे नहीं आ सके।
यहां वे आखिरी बार वर्ष 1995 में आए थे। लोगों के बार-बार आग्रह पर 28 से 30 अक्टूबर तक मुकाम (बीकानेर) में बिश्नोई समाज की स्थापना के 525 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित रजत जयंती समारोह में उन्होंने शिरकत की थी। राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष रहे स्व. पूनमचंद विश्नोई, पूर्व मंत्री स्व. रामसिंह विश्नोई व सांचौर के पूर्व विधायक हीरालाल विश्नोई से उनके घनिष्ठ संबंध थे।
आखिरी बार जोधपुर वे रामसिंह विश्नोई के निधन पर आए थे। इससे पहले उन्होंने 15 से 17 जनवरी 1981 को जोधपुर के टाउन हॉल में अखिल भारतीय बिश्नोई जीव रक्षा सभा की ओर से आयोजित पर्यावरण में जन भागीदारी विषयक राष्ट्रीय सम्मेलन में बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की थी। उस समय वे केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री थे। मारवाड़ में विश्नोई समाज के विकास में उनकी अहम भूमिका रही है। उनके कार्यकाल में ही खेजड़ली गांव में शहीद स्मारक बनाया जा सका। इसके अलावा बीकानेर के मुकाम में मुक्तिधाम व दिल्ली में दस करोड़ की लागत से छात्रावास भी बनाया।
यह कारनामा उन्हें करके भी दिखाया। वे करनाल और फरीदाबाद से भी लोकसभा का चुनाव जीते। जीवन में सिर्फ एक चुनाव करनाल से हार गए थे। जिसका मलाल उन्हें हमेशा रहा। पंचायत समिति हिसार से सदस्य के रूप में अपना राजनीतिक कैरियर शुरू करने वाले भजनलाल 1962 में ब्लाक समिति के सदस्य चुने गए थे। इसी प्लान में चेयरमैन बने। उन्होंने आदमपुर से 1968 मे पहला विधानसभा चुनाव जीता और उसके बाद वे जीतते ही चले गए।
यह उनका रुतबा ही था कि उन्होंने जिसे चाहा उसे ही आदमपुर से चुनाव जिताया। उन्होंने 1987 में अपनी पत्नी जस्मा देवी को विधायक बनाया। उसके बाद 1988 में उन्होंने अपने छोटे बेटे कुलदीप बिश्नोई को विधानसभा में भेजा। उन्होंने फरीदाबाद लोकसभा क्षेत्र से 1989 में सांसद का चुनाव लड़ा और जीत गए। उसके बाद उन्होंने 1998 में करनाल लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा, उन्हें भारी जीत मिली, लेकिन वे 1999 में करनाल से हार गए। उनके करियर में यह पहली और आखिरी हार थी।
चंद्रमोहन को भी बना दिया विधायक
भले ही चंद्रमोहन राजनीति में कामयाब साबित नहीं हुए हो, लेकिन उन्होंने उन्हें छोटी उम्र में ही विधायक बनाया। कालका विस क्षेत्र से चंद्रमोहन ने 1993 में उपचुनाव जीता था। उसके बाद वे 1996, 2000, 2005 में कालका सीट से ही विधायक बने। फिजा प्रकरण के बाद चंद्रमोहन को कांग्रेस ने 2009 के आम चुनावों में टिकट नहीं दिया था।
मारवाड़ से था गहरा लगाव
जोधपुर. हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री एवं अखिल भारतीय बिश्नोई महासभा के संरक्षक भजनलाल बिश्नोई का मारवाड़ से गहरा लगाव था। 1860 में उनके पूर्वज फलौदी तहसील के मोरिया मूंजासर गांव से पंजाब प्रांत के बहावलपुर (अब पाकिस्तान में) पलायन कर गए थे, लेकिन वे अपने पुरखों की धरा को कभी नहीं भूले। वे जब भी राजस्थान के दौरे पर आए तो पूर्वजों के गांव जाना नहीं भूलते थे। पहले वे कपड़े का व्यापार करते थे। उनका मारवाड़ में आना-जाना लगा रहता था।
मारवाड़ से उनके लगाव का इससे भी पता चलता है कि वे परिचितों से कई बार पूछते रहते थे कि यहां इस बार बारिश और फसलों की क्या स्थिति है। बीकानेर मुकाम में ही उन्हें बिश्नोई रत्न की उपाधि से नवाजा गया था। गत वर्ष 2 मई को मूंजासर गांव में जंभेश्वर मंदिर के लोकार्पण समारोह में उनका आने का कार्यक्रम बना था, लेकिन स्वास्थ्य कारणों से वे नहीं आ सके।
यहां वे आखिरी बार वर्ष 1995 में आए थे। लोगों के बार-बार आग्रह पर 28 से 30 अक्टूबर तक मुकाम (बीकानेर) में बिश्नोई समाज की स्थापना के 525 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित रजत जयंती समारोह में उन्होंने शिरकत की थी। राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष रहे स्व. पूनमचंद विश्नोई, पूर्व मंत्री स्व. रामसिंह विश्नोई व सांचौर के पूर्व विधायक हीरालाल विश्नोई से उनके घनिष्ठ संबंध थे।
आखिरी बार जोधपुर वे रामसिंह विश्नोई के निधन पर आए थे। इससे पहले उन्होंने 15 से 17 जनवरी 1981 को जोधपुर के टाउन हॉल में अखिल भारतीय बिश्नोई जीव रक्षा सभा की ओर से आयोजित पर्यावरण में जन भागीदारी विषयक राष्ट्रीय सम्मेलन में बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की थी। उस समय वे केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री थे। मारवाड़ में विश्नोई समाज के विकास में उनकी अहम भूमिका रही है। उनके कार्यकाल में ही खेजड़ली गांव में शहीद स्मारक बनाया जा सका। इसके अलावा बीकानेर के मुकाम में मुक्तिधाम व दिल्ली में दस करोड़ की लागत से छात्रावास भी बनाया।
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